Tuesday, June 21, 2011

यह शक्ति मंत्र पूरी करे हर आरजू़

जीवन में इच्छाओं का अंत नहीं होता। एक पूरी होते ही दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है। इसी कवायद में उम्र बढ़ती है और समय बीतता जाता है। इस दौरान कुछ इच्छाएं पूरी होती भी है, किंतु जो अधूरी रह जाती है। उसके मलाल में इंसान परेशान या बैचेन रहता है। सलिए इच्छाओं पर नियंत्रण के लिए धर्म के रास्ते अनेक उपाय बताए गए है।
इन उपायों में जप, पूजा, हवन आदि प्रमुख है। इसी कड़ी में शक्ति आराधना के विशेष काल में मातृशक्ति के आवाहन और जप का एक ऐसा उपाय है। जिससे जीवन से जुड़ी हर इच्छा जैसे धन, संपत्ति, स्वास्थ्य, योग्य जीवनसाथी आदि पूरी करने में आने वाली बाधा एक ही मंत्र द्वारा दूर की जा सकती है। जानते है नवरात्रि के विशेष समय में किया जाने वाला यह उपाय - 
- नवरात्रि के किसी भी दिन दुर्गा पूजा के समय पूर्व दिशा में मुख करके बैठ जाएं।- नवरात्रि के दिन अनुसार दुर्गा रुप की यथाविधि पूजा कर 21 नारियल लाल कपड़े पर रखकर लाल चंदन, अक्षत से पूजा करें। - इसके बाद अपनी कामनापूर्ति का संकल्प लेकर 21 माला नीचे लिखे मंत्र का जप करें - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै। - मंत्र जप रुद्राक्ष की माला से ही करें। - मंत्र जप पूरे होने पर 21 नारियल लाल कपड़े में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें या किसी योग्य ब्राह्मण को दान करें।- श्रद्धा और आस्था से किया गया यह उपाय मनोरथ पूर्ति में बहुत प्रभावी माना गया है।

मालामाल बनाती है श्रीयंत्र पूजा

दौलतमंद बनाती है ऐसी लक्ष्मी पूजा 
धन या पैसा जीवन की अहम जरुरतों में एक है। आज तेज रफ्तार के जीवन में कईं अवसरों पर यह देखा जाता है कि युवा पीढ़ी चकाचौंध से भरी जीवनशैली को देखकर प्रभावित होती है और बहुत कम समय में ज्यादा कमाने की सोच में गलत तरीकें अपनाती है। जबकि धन का वास्तविक सुख और शांति मेहनत, परिश्रम की कमाई में ही है। ऐसा कमाया धन न केवल आत्मविश्वास के साथ दूसरों का भरोसा भी देता है, बल्कि रुतबा और साख भी बनाता है। 
धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति ऐसे ही तरीकों में विश्वास रखता है। इसलिए मातृशक्ति की आराधना के इस काल में यहां बताया जा रहा है, एक ऐसा ही उपाय जिसको अपनाकर जीवन में किसी भी सुख से वंचित नहीं रहेंगे और धन का अभाव कभी नहीं सताएगा। यह उपाय है श्रीयंत्र पूजा। 
धार्मिक दृष्टि से लक्ष्मी कृपा के लिए की जाने वाली श्रीयंत्र साधना संयम और नियम की दृष्टि से कठिन होती है। इसलिए यहां बताई जा रही है श्रीयंत्र पूजा की सरल विधि जिसे कोई भी साधारण भक्त अपनाकर सुख और वैभव पा सकता है। सरल शब्दों में यह पूजा मालामाल बना देती है। श्रीयंत्र पूजा की आसान विधि कोई भी भक्त नवरात्रि या उसके बाद भी शुक्रवार या प्रतिदिन कर सकता है। 
श्रीयंत्र पूजा के पहले कुछ सामान्य नियमों का जरुर पालन करें - 
- ब्रह्मचर्य का पालन करें और ऐसा करने का प्रचार न करें। - स्वच्छ वस्त्र पहनें।- सुगंधित तेल, परफ्यूम, इत्र न लगाएं।- बिना नमक का आहार लें। - प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र की ही पूजा करें। यह किसी भी मंदिर, योग्य और सिद्ध ब्राह्मण, ज्योतिष या तंत्र विशेषज्ञ से प्राप्त करें। - यह पूजा लोभ के भाव से न कर सुख और शांति के भाव से करें। इसके बाद श्रीयंत्र पूजा की इस विधि से करें। इसे किसी योग्य ब्राह्मण से भी करा सकते हैं - नवरात्रि या किसी भी दिन सुबह स्नान कर एक थाली में श्रीयंत्र स्थापित करें। - इस श्रीयंत्र को लाल कपड़े पर रखें। - श्रीयंत्र का पंचामृत यानि दुध, दही, शहद, घी और शक्कर को मिलाकर स्नान कराएं। गंगाजल से पवित्र स्नान कराएं।- इसके बाद श्रीयंत्र की पूजा लाल चंदन, लाल फूल, अबीर, मेंहदी, रोली, अक्षत, लाल दुपट्टा चढ़ाएं। मिठाई का भोग लगाएं।- धूप, दीप, कर्पूर से आरती करें। - श्रीयंत्र के सामने लक्ष्मी मंत्र, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती या जो भी श्लोक आपको आसान लगे, का पाठ करें। किंतु लालच, लालसा से दूर होकर श्रद्धा और पूरी आस्था के साथ करें।- अंत में पूजा में जाने-अनजाने हुई गलती के लिए क्षमा मांगे और माता लक्ष्मी का स्मरण कर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करें। श्रीयंत्र पूजा की यह आसान विधि नवरात्रि में बहुत ही शुभ फलदायी मानी जाती है। इससे नौकरीपेशा से लेकर बिजनेसमेन तक धन का अभाव नहीं देखते। इसे प्रति शुक्रवार या नियमित करने पर जीवन में आर्थिक कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।

गायत्री के पांच मुखों का रहस्य

धार्मिक पुस्तकों में ऐसे कई प्रसंग या वृतांत पढऩे में आते हैं, जो बहुत ही आश्चर्यजनक हैं। लाखों-करोड़ों देवी-देवता, स्वर्ग-नर्क, आकाश-पाताल, कल्पवृक्ष, कामधेनु गाय, इन्द्रलोक....और भी न जाने क्या-क्या। इन आश्चर्यजनक बातों का यदि हम शाब्दिक अर्थ निकालें तो शायद ही किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं। अधिकांस घटनाओं का वर्णन प्रतीकात्मक शैली में किया गया है। गायत्री के पांच मुखों का आश्चर्यजनक और रहस्यात्मक प्रसंग भी कुछ इसी तरह का है। यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। ये पांच तत्व ही गायत्री के पांच मुख हैं। मनुष्य के शरीर में इन्हें पांच कोश कहा गया है। इन पांच कोशों का उचित क्रम इस प्रकार है:- 
- अन्नमय कोश - प्राणमय कोश - मनोमय कोश - विज्ञानमय कोश - आनन्दमय कोश
ये पांच कोश यानि कि भंडार, अनंत ऋद्धि-सिद्धियों के अक्षय भंडार हैं। इन्हें पाकर कोई भी इंसान या जीव सर्वसमर्थ हो सकता है। योग साधना से इन्हें जाना जा सकता है, पहचाना जा सकता है। इन्हें सिद्ध करके यानि कि जाग्रत करके जीव संसार के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है। जीव का 'शरीर' अन्न से, 'प्राण' तेज से, 'मन' नियंत्रण से, 'ज्ञान' विज्ञान से और कला से 'आनन्द की श्रीवृद्धि होती है। गायत्री के पांच मुख इन्हीं तत्वों के प्रतीक हैं।

गायत्री की दस भुजाओं का रहस्य

वैज्ञानिक तरीके से शोध-अनुसंधान करने के बाद ही देवी-देवता सम्बंधी मान्यता की स्थापना हुई है। आज के तथाकथित पढ़े लिखे लोग देवी-देवता सम्बंधी बातों को अंधविश्वास या अंध श्रृद्धा कहते हैं, किन्तु उनका ऐसा सोचना, उनके आधे-अधूरे ज्ञान की पहचान है। चित्रों और मूर्तियों में देवी-देवताओं को एक से अधिक हाथ और कई मुखों वाला दिखाया जाता है। इन बातों के वास्तविक अर्थ क्या है? इस तरह के सारे प्रश्रों और जिज्ञासाओं का समाधान हम लगातार करते रहेंगे। इसी कड़ी में आज यह जानेगे कि गायत्री की दश भुजाओं का क्या अर्थ है:- 
इंसान के जीवन में दस शूल यानि कि कष्ट हैं। ये दस कष्ट है—दोषयुक्त दृष्टि, परावलंबन ( दूसरों पर निर्भर होना) , भय, क्षुद्रता, असावधानी, क्रोध, स्वार्थपरता, अविवेक, आलस्य और तृष्णा। गायत्री की दस भुजाएं इन दस कष्टों को नष्ट करने वाली हैं। इसके अतिरिक्त गायत्री की दाहिनी पांच भुजाएं मनुष्य के जीवन में पांच आत्मिक लाभ—आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, आत्म-अनुभव, आत्म-लाभ और आत्म-कल्याण देने वाली हैं तथा गायत्री की बाईं पांच भुजाएं पांच सांसारिक लाभ—स्वास्थ्य, धन, विद्या, चातुर्य और दूसरों का सहयोग देने वाली हैं।
दस भुजी गायत्री का चित्रण इसी आधार पर किया गया है। ये सभी जीवन विकास की दस दिशाएं हैं। माता के ये दस हाथ, साधक को उन दसों दिशाओं में सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। गायत्री के सहस्रो नेत्र, सहस्रों कर्ण, सहस्रों चरण भी कहे गए हैं। उसकी गति सर्वत्र है।

कौन हैं लक्ष्मी, काली और सरस्वती ?

सेकड़ों देवी-देवताओं वाले हिन्दू धर्म को अज्ञानतावश कुछ लोग अंधश्रृद्धा वाला धर्म कह देते हैं, किन्तु संसार में सर्वाधिक वैज्ञानिक धर्म कोई है तो वह सनातन हिन्दू धर्म ही है। सामान्य इंसान भी धर्म के मर्म यानि गहराई को समझ सके, यह सौच कर ही ऋषि-मुनियों ने विश्व की विभिन्न सूक्ष्म शक्तियों को देवी-देवताओं के रूप में चित्रित किया है। ईश्वर या परमात्मा अपने तीन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए तीन रूपों में प्रकट हुआ- ब्रह्म, विष्णु और महेश। ब्रह्म को रचनाकार, विष्णु को पालनहार और महेश को संहार का देवता कहा गया है। इस त्रिमूर्ति की तीन शक्तियां हैं- ब्रह्म की महासरस्वती, विष्णु की महालक्ष्मी और महेश की महाकाली।इस तरह परमात्मा अपनी शक्ति से संसार का संचालन करता है।
हम किसी भी वस्तु के बारे में उसका इतिहास इसी क्रम से जानते हैं- उसका निर्माण, उसकी अवस्था और उसका अंत। इसी क्रम में ब्रह्म-विष्णु-महेश का क्रम भी त्रिमूर्ति में कहा गया है। किंतु जब जीवन में शक्ति की उपासना होती है तो यह क्रम उलटा हो जाता है - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। 
संहार- हम उन बुराइयों का संहार करें, जो बीमारी की तरह हमारे समूचे जीवन को नष्ट कर देती है। बीमारी को जड़ से काट कर जीवन को बचाएं। पोषण- जब बीमारी कट जाए तो शरीर की ताकत बढ़ाने वाला आहार लेना चाहिए। बुराइयां हटाकर जीवन में सद्गुणों का रोपण करें, जिससे आत्मविश्वास मजबूत हो।
रचना- जब जीवन बुराइयों से मुक्त होकर सद्गुणों को अपनाता है तो हमारे आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण शुरू होता है। संसार संचालन के लिए परमात्मा को अतुलनीय शक्ति, पर्याप्त धन और निर्मल विद्या की आवश्यकता होती है, इसीलिए उसकी शक्ति महाकाली का रंग काला, महालक्ष्मी का रंग पीला (स्वर्ण) और सरस्वती का रंग सफेद (शुद्धता) है। हमें जीवन में यही मार्ग अपनाना चाहिए अर्थात समाज से बुराइयों का नाश और सदाचार का पोषण करें, तभी आदर्श समाज का नवनिर्माण होगा। यह हम तब ही कर सकते हैं जब हमारे पास वीरता, धन और शिक्षा जैसी शक्तियां हों।

दौलतमंद बनाती है ऐसी लक्ष्मी पूजा

शुक्रवार के दिन विशेष रुप से महालक्ष्मी पूजा बहुत ही धन-वैभव देने वाली और दरिद्रता का अंत करने वाली मानी जाती है। पुराणों में भी माता लक्ष्मी को धन, सुख, सफलता और समृद्धि देने वाली बताया गया है। 
नवरात्रि में देवी पूजा के विशेष काल में हर भक्त देवी के अनेक रुपों की उपासना के अलावा महालक्ष्मी की पूजा कर अपने व्यवसाय से अधिक धनलाभ, नौकरी में तरक्की और परिवार में आर्थिक समृद्धि की कामना पूरी कर सकता है। जो भक्त नौकरी या व्यवसाय के कारण अधिक समय न दे पाएं उनके लिए यहां बताई जा रही है लक्ष्मी के धनलक्ष्मी रुप की पूजा की सरल विधि। इस विधि से लक्ष्मी पूजा नवरात्रि के नौ रातों के अलावा हर शुक्रवार को कर धन की कामना पूरी कर सकते हैं -
- आलस्य छोड़कर सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। क्योंकि माना जाता है कि लक्ष्मी कर्म से प्रसन्न होती है, आलस्य से रुठ जाती है। - घर के देवालय में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर चावल या अन्न रखकर उस पर जल से भरा मिट्टी का कलश रखें। यह कलश सोने, चांदी, तांबा, पीतल का होने पर भी शुभ होता है। - इस कलश में एक सिक्का, फूल, अक्षत यानि चावल के दाने, पान के पत्ते और सुपारी डालें।- कलश को आम के पत्तों के साथ चावल के दाने से भरा एक मिट्टी का दीपक रखकर ढांक दें। जल से भरा कलश विघ्रविनाशक गणेश का आवाहन होता है। क्योंकि वह जल के देवता भी माने जाते हैं। - चौकी पर कलश के पास हल्दी का कमल बनाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति और उनकी दायीं ओर भगवान गणेश की प्रतिमा बैठाएं। - पूजा में कलश बांई ओर और दीपक दाईं ओर रखना चाहिए।- माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने श्रीयंत्र भी रखें। - इसके अलावा सोने-चांदी के सिक्के, मिठाई, फल भी रखें। - इसके बाद माता लक्ष्मी की पंचोपचार यानि धूप, दीप, गंध, फूल से पूजा कर नैवेद्य या भोग लगाएं।- आरती के समय घी के पांच दीपक लगाएं। इसके बाद पूरे परिवार के सदस्यों के साथ पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ माता लक्ष्मी की आरती करें।- आरती के बाद जानकारी होने पर श्रीसूक्त का पाठ भी करें। 
- अंत में पूजा में हुई किसी भी गलती के लिए माता लक्ष्मी से क्षमा मांगे और उनसे परिवार से हर कलह और दरिद्रता को दूर कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करें।- आरती के बाद अपने घर के द्वार और आस-पास पूरी नवरात्रि या हर शुक्रवार को दीप जलाएं।

आपकी राशि के लिए किस देवी की पूजा?

नवरात्रि आराधना का श्रेष्ठ फल पाने का अवसर होता है। हर राशि के लोगों के लिए नवरात्रि में अलग-अलग देवी की उपासना बताई गई है। जिससे वे अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए सही पूजा पाठ कर सकें। हर राशि के ग्रह और नक्षत्रों के आधार पर उनकी अलग-अलग देवियां मानी गई हैं। दश महाविद्या के मुताबिक हर राशि के लिए एक अलग महाविद्या की उपासना करने से, उनके बीज मंत्रों के जप से किसी भी काम में आसानी से सफलता पाई जा सकती है।
मेष- मेष राशि के जातक शक्ति उपासना के लिए द्वितीय महाविद्या तारा की साधना करें। ज्योतिष के अनुसार इस महाविद्या का स्वभाव मंगल की तरह उग्र है। मेष राशि वाले महाविद्या की साधना के लिए इस मंत्र का जप करें।
मंत्र- ह्रीं स्त्रीं हूं फट्
वृषभ- वृषभ राशि वाले धन और सिद्धि प्राप्त करने के लिए श्री विद्या यानि षोडषी देवी की साधना करें और इस मंत्र का जप करें।
मंत्र- ऐं क्लीं सौ:
मिथुन- अपना गृहस्थ जीवन सुखी बनाने के लिए मिथुन राशि वाले भुवनेश्वरी देवी की साधना करें। साधना मंत्र इस प्रकार है।
मंत्र- ऐं ह्रीं
कर्क- इस नवरात्रि पर कर्क राशि वाले कमला देवी का पूजन करें। इनकी पूजा से धन व सुख मिलता है। नीचे लिखे मंत्र का जप करें।
मंत्र- ऊं श्रीं
सिंह - ज्योतिष के अनुसार सिंह राशि वालों को मां बगलामुखी की आराधना करना चाहिए। जिससे शत्रुओं पर विजय मिलती है।
मंत्र- ऊं हृी बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय
जिहृं कीलय कीलय बुद्धिं विनाशाय हृी ऊं स्वाहा
कन्या- आप चतुर्थ महाविद्या भुवनेश्वरी देवी की साधना करें आपको निश्चित ही सफलता मिलेगी।
मंत्र- ऐं ह्रीं ऐं 
तुला- तुला राशि वालों को सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए षोडषी देवी की साधना करनी चाहिए। 
मंत्र- ऐं क्लीं सौ:
वृश्चिक- वृश्चिक राशि वाले तारा देवी की साधना करें। इससे आपको शासकीय कार्यों में सफलता मिलेगी।
मंत्र- श्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं फट्
धनु - धन और यश पाने के लिए धनु राशि वाले कमला देवी के इस मंत्र का जप करें।
मंत्र- श्रीं
मकर- मकर राशि के जातक अपनी राशि के अनुसार मां काली की उपासना करें।
मंत्र- क्रीं कालीकाये नम:
कुंभ- कुंभ राशि वाले भी काली की उपासना करें इससे उनके शत्रुओं का नाश होगा।
मंत्र- क्रीं कालीकाये नम:
मीन- इस राशि के जातक सुख समृद्धि के लिए कमला देवी की उपासना करें।
मंत्र- श्री कमलाये नम: